हिंदी वैदिक संस्कृति से लौकिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से पाली, पाली से अपभ्रंश और अपभ्रंश से भाषा के अनेक रूपों में रूपांतरित होती हुई आज की आधुनिक हिंदी भाषा के रूप में परिणत हुई है l परंतु हिंदी अपभ्रंश की अवस्था से प्राचीन हिंदी अवस्था को कब पहुंची, इस विषय में विद्वानों के विभिन्न मत है l कुछ विद्वान हिंदी का श्रीगणेश बौद्ध धर्म की बजरयानी शाखा के चौरासी सिद्धों के सिद्ध साहित्य से मानते हैं l इन सिद्धो ने अपने ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में की, परंतु फिर भी उनमें कही न कहीं आज की हिंदी भाषा के अंकुर दिखाई देते हैं